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कानपुर देहात महज कहावत बनकर रह गई है 2 जून की रोटी

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महज कहावत बनकर रह गई है 2 जून की रोटी

रोटी की जगह फास्ट फूड खाने का बढ़ा प्रचलन

कानपुर देहात। दो जून की रोटी सिर्फ मेहनतकश जिंदगी की कहावत बनकर रह गई है। अब यह सोशल मीडिया का ट्रेंड बन चुकी है। हर साल की तरह इस बार भी 2 जून को इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर पर दो जून की रोटी टॉप ट्रेंड्स में बना हुआ है। एक समय था जब दो जून की रोटी केवल एक कहावत नहीं बल्कि जीवन का असली दस्तावेज हुआ करती थी। सूरज उगता था और आदमी काम धाम की ओर निकल पड़ता था, मन में एक ही लक्ष्य, शाम को थककर लौटे तो घरवालों के हाथ की रोटी मिल जाए। उस रोटी में स्वाद कम, श्रम अधिक होता था। नमक प्याज के साथ भी वह रोटी इतनी स्वादिष्ट लगती थी कि जैसे पूरी दुनिया की तृप्ति उसी थाली में परोस दी गई हो फिर वक्त बदला, रोटी की जगह ले ली पिज्जा-बर्गर ने। अब रोटी बनाना नहीं पड़ता, ऑर्डर करना पड़ता है और इस नए जमाने में रोटी की हालत ऐसी हो गई है जैसे किसी बूढ़े दादा की। सब जानते हैं कि वो जरूरी हैं लेकिन साथ कोई नहीं बैठता। अब दो जून की रोटी का मतलब है पेट भरने की मजबूरी, न कि आत्मा को तृप्त करने का अवसर। आज के बच्चे रोटी नहीं, रैप खाते हैं। रोटी अब सादगी की निशानी नहीं रही, वो ट्रेंड से बाहर हो चुकी है। उसे खाने के लिए या तो डॉक्टर की सलाह होनी चाहिए या गरीबी की मजबूरी। बाजार ने हमें इतने नकली स्वाद दे दिए हैं कि अब असली भूख का अहसास ही खो गया है। और जब कोई कहता है “दो जून की रोटी मिल जाए बस” तो लोग हंस पड़ते हैं जैसे वह कोई पुरानी फिल्म का संवाद बोल रहा हो। जब बच्चे पूछें रोटी क्या होती है? तो जानिए कि असली स्वाद, सच्ची तृप्ति और मेहनत का आदर हम यूं ही बाजार की थाली में गंवा चुके हैं क्योंकि दो जून की रोटी अब तवे पर नहीं, सोशल मीडिया की रीलों में सिक रही है फिल्टर के साथ और आत्मा के बिना।
दो जून की रोटी का क्या है मतलब-
मुहावरे का अर्थ समझें तो दो जून की रोटी का मतलब है दो वक्त की रोटी जुटाना। जून शब्द अवधी भाषा से लिया गया है। जून का मतलब होता है समय। एक तबका है जिसे अगर सुबह की रोटी मिल जाती है तो जरूरी नहीं कि शाम की भी मिल ही जाएगी इन्हीं लोगों द्वारा दो जून की रोटी मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है। यह मुहावरा गरीब तबके के दु:ख और उसकी वेदना को दर्शाता है। इसी के चलते दो जून की रोटी मुहावरे का प्रयोग प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार अपनी कहानियों में कर चुके हैं। वहीं फिल्मी परदे पर भी इस मुहावरे का खूब इस्तेमाल किया जाता रहा है।
हास्य-व्यंग्य दिवस-
2 जून लोगों के लिए एक हास्य और व्यंग्य दिवस के रूप में बन चुका है। 2 जून की रोटी दरअसल एक मुहावरे के रूप में मशहूर है जिसका मतलब दो वक्त की रोटी मिलने से है। सोशल मीडिया के बदलते ट्रेंड के बीच अब लोगों द्वारा 2 जून आते ही तरह-तरह के फनी मैसेज 2 तारीख को 2 जून से जोड़ते हुए शेयर किए जाने लगते हैं। इस बीच लोगों को हंसने के बहाने खोजने के लिए इस तरह के मैसेज को शेयर करने की एक वजह भी मिल जाती है।

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