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कानपुर देहात 20 से कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक और मिडिल स्कूलों को बंद करने

अपनी नाकामी को छिपाने के लिए 20 से कम छात्र संख्या वाले परिषदीय विद्यालयों को किया जा रहा है मर्ज

कानपुर देहात

20 से कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक और मिडिल स्कूलों को बंद करने की तैयारी चल रही है। स्कूल शिक्षा विभाग ने ऐसे स्कूलों की जानकारी मांगी है। ऐसे स्कूलों को मर्ज किया जाएगा और यहां के शिक्षक उन स्कूलों में भेजे जाएंगे जहां स्टूडेंट्स अधिक और शिक्षक कम हैं। आदेश के बाद शिक्षकों में हलचल तेज हो गई है। शिक्षक सरकार के इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिम्मेदारों द्वारा 20 से कम छात्रों वाले परिषदीय विद्यालयों को मर्ज करने का प्रस्ताव केवल प्रशासनिक आंकड़ों को समेटने की कवायद नहीं बल्कि ग्रामीण शिक्षा की आत्मा पर सीधा प्रहार करना है। प्राथमिक विद्यालय किसी भवन या संख्या का नाम नहीं होता वह गाँव के बच्चों के लिए आत्मविश्वास, पहली पहचान और जीवन की बुनियाद होता है। इन स्कूलों का मर्जर दरअसल गाँवों की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय भाषिकता और बच्चों के सामुदायिक जुड़ाव को नष्ट करने की एक धीमी लेकिन सुनिश्चित प्रक्रिया है। नजदीकी विद्यालय में मर्जर एक ऐसा शब्द है जिसमें बच्चों को 4–5 किलोमीटर दूर भेजने की विवशता छुपी है जिससे न केवल शिक्षा की निरंतरता बाधित होगी बल्कि छात्र संख्या में गिरावट और अंततः बाल श्रम या बाल विवाह जैसे खतरों की वापसी भी संभव है। यह निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की बजाय बच्चों की ऊर्जा, समय और रुचि की बलि देने जैसा है। शिक्षकों के संदर्भ में भी यह मर्जर एक अघोषित विस्थापन है। जिन स्कूलों को मर्ज किया जाएगा वहाँ कार्यरत शिक्षक अपने आत्मीय परिवेश, स्थायित्व और संबंधों से कटकर एक नई अनिश्चितता में धकेले जाएंगे, जो उनके शिक्षण मनोविज्ञान और कार्य दक्षता दोनों पर विपरीत असर डालेगा। इससे शिक्षक एक संवेदनशील मार्गदर्शक न रहकर सिर्फ एक ड्यूटी करने वाला कार्मिक बन जाएगा। मर्जर की प्रक्रिया में कहीं भी शिक्षकों, अभिभावकों, ग्रामसभाओं या बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों से संवाद नहीं किया गया है। यह नीति ऊपर से थोपी गई एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है जो लोकतांत्रिक विमर्श की जगह प्रशासनिक आदेशों के जरिए शिक्षा को नियंत्रित करने की मंशा जाहिर करती है। इसके पीछे एक गहरा भयावह संकेत यह भी है कि कहीं यह गाँवों को कमजोर करके शहरी केंद्रीकरण या निजीकरण की गुप्त तैयारी तो नहीं हो रही है। प्राथमिक शिक्षा में मर्जर की यह नीति शिक्षा को सशक्त, सुलभ और आत्मीय बनाने की नहीं बल्कि उसे प्रदर्शनी और संख्या आधारित निष्प्राण व्यवस्था में ढालने की ओर बढ़ रही है इसीलिए जरूरी है कि शिक्षाविद, शिक्षक, अभिभावक और ग्रामीण समाज इस निर्णय पर जिम्मेदारों से संवाद करें और यह संदेश दें कि शिक्षा कोई स्प्रेडशीट नहीं, यह जीवन के पहले संवाद की शुरुआत है जिसे मर्ज नहीं किया जा सकता जिसे मिटाया नहीं जा सकता। परिषदीय विद्यालयों में अधिकांशतः गरीब तबके के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं ऐसे में यदि मर्जर के बहाने विद्यालयों को बन्द करने का कुचक्र चला तो सबसे पहले गरीबों की शिक्षा का हक छिनेगा। विद्यालयों के मर्जर से विद्यालयों की दूरी बढ़ जायेगी जिसके कारण कक्षा 1, 2 व 3 के बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पायेंगे जिस कारण उनके शिक्षा से वंचित होने का खतरा बढ़ जायेगा। मर्जर के प्रकरण पर जब संवाददाता ने कुछ अभिभावकों से बात की तो उन लोगो ने मुखर होकर अपनी बात रखते हुए बताया कि शासन का यह गलत कदम है विद्यालय दूर होने से बच्चों की सुरक्षा प्रभावित होगी। सरकार जानबूझकर ऐसा कर रही है ताकि गरीबों के बच्चे शिक्षा से वंचित रहें।

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