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राम मंदिर बनाना आसान था गुलामी का ‘ढांचा’ गिराना बहुत कठिन कौन था

राम मंदिर बनाना आसान था गुलामी का ‘ढांचा’ गिराना बहुत कठिन कौन था लॉर्ड मैकाले, PM मोदी ने लिया जिसका नाम अंग्रेजों के आने से पहले कैसी थी भारत की शिक्षा व्यवस्था?

राम मंदिर पर धर्म ध्वजा के माध्यम से मंदिर निर्माण के संकल्प की सिद्धि के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और अत्यंत महत्वपूर्ण संकल्प व्यक्त किया यह संकल्प देश को गुलामी की मानसिकता से मुक्ति दिलाने का है

प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें आजादी तो मिली लेकिन गुलामी की मानसिकता में ढल जाने के कारण हम हीन भावना से नहीं उबर सके

हमें विदेश की हर चीज अच्छी लगती है और अपनी हर चीज में खोट नजर आती है

पीएम ने तमिलनाडु के एक गांव में
स्थित एक हजार वर्ष पुराने शिलालेख का उल्लेख करते हुए कहाकि उस पर अत्यंत सुंदर शब्दों में तत्कालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था का विवरण मिलता है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैकाले की शिक्षा नीति को लेकर कहा
मैकाले ने मानसिक गुलामी की नींव रखी

10 साल बाद 2035 में उस अपवित्र घटना को 200 साल पूरे हो रहे हैं

मोदी ने कहा कि यह गुलामी की मानसिकता का ही असर है कि हमारे संविधान को भी विदेश से प्रेरित बताया गया, जबकि सच यह है कि भारत लोकतंत्र की जननी (मदर आफ डेमाक्रेसी) है

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को लेकर अक्सर चर्चा होती है, तमाम शिक्षाविद् भी इस पर सवाल उठाते रहे हैं
अब इस एजुकेशन सिस्टम का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जिक्र किया है

उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान कहा कि मैकाले ने मानसिक गुलामी की नींव रखी थी

इस सिस्टम को आने वाले 10 सालों में खत्म करने का टारगेट रखा गया है यानी अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी चल रही है
अंग्रेजों के आने से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था काफी अलग थी
पहले भारत में स्कूलों की जगह गुरुकुल चलते थे. भारत के लगभग हर गांव में गुरुकुल हुआ करता था जिसमें तमाम बच्चों को अलग-अलग विषयों की शिक्षा दी जाती थी
उस जमाने में वैदिक गणित खगोलशास्त्र, धातु विज्ञान, कारीगरी, रसायन शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र जैसे कुल 18 विषयों की पढ़ाई होती थी
इसमें औषधि विज्ञान और शल्य क्रिया का विषय भी शामिल था, यानी उस जमाने में सर्जरी और मेडिसिन की पढ़ाई भी कराई जाती थी
कुल 15 से 16 साल में इन सभी विषयों की पढ़ाई पूरी होती थी

आज छात्रों को परीक्षा से ठीक पहले रट्टा मारते हुए आपने कई बार देखा होगा. जो किताब में लिखा है उसे दीमक की तरह बच्चे चाट लेते हैं और बिना समझे एग्जाम में टॉप भी कर लेते हैं

वैदिक शिक्षा में ऐसा नहीं था. भारतीय शिक्षा प्रणाली में आचार्य एक विषय की पढ़ाई कराने के बाद उन्हें उसी के आधार पर काम सौंप देते थे, काम की कुशलता से ये तय होता था कि बच्चा वाकई पास है या फिर फेल… इस तरह से छात्रों को तमाम चीजों में निपुण किया जाता था.
अंग्रेज मानते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे ज्यादा विकसित और अच्छी व्यवस्था है. इसे खत्म करने के लिए भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर ब्रिटिश संसद में काफी ज्यादा चर्चा हुई
जिसके बाद ये तय हुआ कि इसे पूरी तरह से बदल दिया जाएगा
इसके लिए ब्रिटिश लॉ मेकर लॉर्ड मैकाले के सुझाव पर इंडियन एजुकेशन एक्ट (1858) लाया गया. हालांकि 1835 में ही इसकी नींव रख दी गई थी
मैकाले ने सुझाव दिया कि भारत में अंग्रेजी में ही पढ़ाई होनी चाहिए.
मैकाले का कहना था कि वो भारत के लोगों को ऐसी शिक्षा देना चाहते हैं जिससे वो रंग या शक्ल से तो भारतीय रहें
लेकिन उनका दिमाग ब्रिटिश हो
लॉर्ड मैकाले का पूरा नाम थॉमस बैबिंगटन मैकाले था, उसे भारत में अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई का जनक कहा जाता है
यही वजह है कि उन्हें भारत में लोक शिक्षा समिति का सभापति बनाया गया
इसके बाद 1935 में मैकाले ने अपना मशहूर स्मरण-पत्र गर्वनर काउंसिल के सामने रखा
जिसे इंडियन एजुकेशन एक्ट की नींव कहा जाता है

लॉर्ड मैकाले ने गुरुकुलों को खत्म करने का काम किया, साथ ही संस्कृत में होने वाली पढ़ाई का भी अंत कर दिया इनकी जगह कॉन्वेंट स्कूलों और अंग्रेजी पर जोर दिया गया. संस्कृत भाषा में चलने वाले गुरुकुलों को मान्यता देने से इनकार कर दिया गया इसके बाद से ही अंग्रेजी मीडियम, सिलेबस और स्कूलों की व्यवस्था शुरू हो गई जो आज तक चली आ रही है

यही वजह है कि इसे गुलामी की मानसिकता वाली शिक्षा व्यवस्था कहा जाता है

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